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तुम रुठे मुझसे जबसे सब रुठा-रुठा लगता है।






तुम रुठे मुझसे जबसे सब रुठा-रुठा लगता है


दुआ इबादत और खुदा सब झूठा-झूठा लगता है


सच लगते थे सब ख्वाब अधेंरी रातों के


और सच य़े है की अब सच भी मुझको झूठा-झूठा लगता है


अजब है य़े बरखा भी अब य़े भी रोज बरसाती है


फिर भी य़े सावन मुझको सूखा-सूखा लगता है


कोयल की बोली भी मुझको करकश लगती है


और वो फूलों की बगियां भी अब सूखी-सूखी सी लगती है


याद है मुझको वो रातें भी जाब चंद सितारे साथ हमारे चलते थे


अब दुनियां चलती है साथ मेरे पर सब रुका-रुका सा लगता है



                                        Dr. Raj Bahadur Singh

                         Assistant Professor
                  NIT, Hamirpur





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