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तुम रुठे मुझसे जबसे सब रुठा-रुठा लगता है।






तुम रुठे मुझसे जबसे सब रुठा-रुठा लगता है


दुआ इबादत और खुदा सब झूठा-झूठा लगता है


सच लगते थे सब ख्वाब अधेंरी रातों के


और सच य़े है की अब सच भी मुझको झूठा-झूठा लगता है


अजब है य़े बरखा भी अब य़े भी रोज बरसाती है


फिर भी य़े सावन मुझको सूखा-सूखा लगता है


कोयल की बोली भी मुझको करकश लगती है


और वो फूलों की बगियां भी अब सूखी-सूखी सी लगती है


याद है मुझको वो रातें भी जाब चंद सितारे साथ हमारे चलते थे


अब दुनियां चलती है साथ मेरे पर सब रुका-रुका सा लगता है



                                        Dr. Raj Bahadur Singh

                         Assistant Professor
                  NIT, Hamirpur





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मैं तो हू गोकुल का ग्वाला ।

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न जाने कितने अनकही बातें हम साथ लेके जायेंगे  झूठ कहते है लोग  की खाली हाथ आये थे  खाली  हाथ जाएंगे  दोस्तों अगर हम अपनी जिंदंगी में झांक कर देखे तो पता चले की हम ने आज तक आपनो से कितनी ऎसे बातें कहनी होंगी  जिन का हमने आपनो से जिक्र ही न किया हो।  हर इंसान को यहाँ मालूम हैं की हम खाली हाथ आये थे और खाली हाथ जायेंगे फिर भी वो इंसान जिंदगी भर लगा रहता है दौलत कमाने ने।  आखीर में वही इंसान को जब वास्तवीक  परिस्थिती का अनुभव होता है तब वो उसकी दौलत तो नहीं लेके जा सकता लेकिन ऐसी  बहुत सी अनकही बातें होती है जो उस इंसान के साथ ही चली जाती है। आखिरी समय में वह इंसान मन की बातें तो बताना चाहता है लेकिन तब उसके बस में कुछ नहीं रहता।  या तो जिसको बताना चाहता है वही नहीं रहता या तो वह बात कहने में बहुत देर हो चुकी रहती।  वो अनकही बातें कुछ भी हो सकती है।  जैसे की किसी को बताना हो की आप के लिए वो इंसान कितना जरुरी है।  या फिर आप उसको कितना चाहते हो।...